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क्यों मानते हैं मुहर्रम, इस दिन कौन मनाता है मातम?

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मुहर्रम

मुहर्रम इस्लाम का महत्वपूर्ण और पवित्र मासिक उत्सव है, जो इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम के तेहवील से शुरू होता है। इसलिए, इसका नाम मुहर्रम के नाम से जाना जाता है। इस महीने का पहला दिन नए इस्लामी साल (हिजरी साल) के तौर पर भी मनाया जाता है। हिजरी साल इस्लामी प्रोफेट मुहम्मद साहब (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) के हिजरत के समय से शुरू होता है। इस महीने से ही इस्लाम का नया साल शुरू माना जाता है। इस दिन पैगंबर मोहम्मद के नाती इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। इसलिए मुहर्रम को गम के तौर पर मनाया जाता है।

मुहर्रम का महत्व:

मुहर्रम का महत्व शीया मुस्लिम समुदाय में अधिक उच्च होता है और वे इसे महत्वपूर्ण मौके के रूप में याद करते हैं। इस महीने के दसवें दिन को आशूरा कहा जाता है, जिसे यादगार बनाने के लिए विशेष तौर पर इकट्ठा होने की संस्कृति है।

आशूरा के दिन की महत्वता:

हुसैन इब्न अली शहीदी: आशूरा के दिन को याद करते हुसैन इब्न अली, इमाम हसन और इमाम हुसैन के चाचा-भतीजे की शहादत को जिन्होंने क़र्बला युद्ध में दी। हुसैन इब्न अली की शहादत को शीया मुस्लिम समुदाय अत्यंत भावुक भाव से याद करते हैं।

आशूरा का पवित्र माहौल: इस दिन को मातम या अज़ादारी के साथ गुजारा किया जाता है। लोग मुहर्रम के महीने में मातम करते हैं, जो रोते रहने, रुई फैलाने, गायबान में जाने, रंगीन कपड़े न पहनने, और धूमधाम से मनाने जैसे रिवाज़ों को त्याग देते हैं।

यह उत्सव सुन्नी मुस्लिम समुदाय में भी माना जाता है, लेकिन उनके लिए यह बस इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का एक दिन होता है, और उन्हें शोक में नहीं धकेला जाता है। इसे उनके धार्मिक महत्व के साथ मनाया जाता है, और लोग मस्जिदों में एकजुट होकर नमाज़ पढ़ते हैं और अच्छी करियाँ करने की चेष्टा करते हैं।

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